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पंचकर्म ने डॉ. सत्येंद्र नारायण ओझा को दिया नया जीवन

By NirogStreet Desk| posted on :   07-Jan-2019| NirogStreet News

पंचकर्म का चमत्कार : महाराष्ट्र के अन्ना साहब ढांगे आयुर्वेद कॉलेज सांगली के निदेशक डॉ. सत्येंद्र नारायण ओझा पंचकर्म के गुण गिनाते थकते नहीं क्योंकि आज इसी थेरेपी की बदौलत वे सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं। दरअसल 13 जुलाई 2013 को हुए एक सड़क हादसे में डॉ. सत्येंद्र को मौत के करीब पहुंचा दिया था, हाथ-पैरों ने काम करना बंद कर दिया था। न्यूरोसर्जन ने सर्जरी की सलाह दी थी, लेकिन सर्जरी के बाद भी उनके ठीक होने पर संदेह था। ऐसे में उन्होंने पंचकर्म का सहारा लिया और मौत की राह पर चल रही जिंदगी को फिर से जिंदगी की पटरी पर ले आए।

डॉ. सत्येंद्र नारायण ओझा बताते हैं - खुद आयुर्वेदिक डॉक्टर होने के कारण मैंने पंचकर्म का सहारा लिया और आज बिल्कुल ठीक हूं। उस वक़्त मुझे सर्जरी करने की सलाह मिली थी लेकिन जब मैंने पूछा कि आयुर्वेदिक थैरेपी कर सकता हूं, तो उन्होंने कहा कि उसमें कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे में मैंने सर्जरी के बजाय पंचकर्म शुरू किया। हादसे के सातवें दिन ही अभयंग, स्वेदन और बस्ती को करना आरंभ किया। जिस अस्पताल में मैं था, वहीं पर मेरे विद्यार्थी मालिश और अन्य विधियां करते थे। मेरे जिन पैरों व हाथों ने काम करना बंद कर दिया था, उनमें हरकत शुरू हो गई और एक माह में मैंने वॉकर के सहारे चलना शुरू कर दिया। 12-12 घंटे तक मैं पंचकर्म करता और इसी का नतीजा रहा कि अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मैंने बिना किसी सर्जरी से रिकवरी शुरू कर दी। घर आने पर मैंने अपने कामों पर किसी के सहारे रहने के बजाय खुद करना आरंभ किया। हादसे के तीसरे महीने मैंने कॉलेज में पढ़ाना शुरू दिया। जिन डॉक्टर ने मुझे ऑपरेशन की सलाह दी थी, वह भी मुझे देख हैरान थे।

बकौल डॉ. ओझा, हम जो भी हरकत करते हैं, उससे हमारे अंगों को गति मिलती है। पंचकर्म और आयुर्वेद हमारे पूर्वजों की दी हुई ऐसी विधाएं हैं, जिनके प्रयोग से हम रोगों से छुटकारा पा सकते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पंचकर्म वक्त मांगता है, वहीं आज के दौर में कुछ स्थानों पर पंचकर्म की फीस इतनी बढ़ा दी गई है कि आम इंसान चाहकर भी इसका लाभ नहीं ले पाता।

मेरी उम्र अभी पांच साल चार महीने है बकौल डॉ. ओझा, हादसे के बाद मैंने शून्य से अपना जीवन जीना शुरू किया था। पंचकर्म की बदौलत आज मेरी उम्र पांच साल चार महीने है। जब हम जन्म लेते हैं तो हमारी देखरेख मां करती हैं, लेकिन मैने पंचकर्म की मदद से खुद की मां बनकर अपनी जीवन को जी रहा हूं। घर का हर काम स्वयं करता हूं।

(मूलस्रोत : जागरण)

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