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मानवता को खत्म करने के लिए परमाणु बमों की जरूरत नहीं है, एक वायरस ही काफी है

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By NS Desk | 24-Mar-2020

coronavirus and world cinema

संकट में इंसान जानवर से भी ज्यादा भयानक हो जाता है। हमारी चमक दमक और ऐशो आराम वाली सभ्यता मूल्य विहीन हो चुकी है। अब मानवता को खत्म करने के लिए परमाणु बमों की जरूरत नहीं है, एक वायरस ही काफी है।

कोरोनावायरस के कारण दुनिया भर में जो जान - माल की क्षति हुई है, वह डराने वाली है। ऐसा तो द्वितीय विश्व युद्ध में भी नहीं हुआ। दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं खतरे में पड़ गई है। अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और इटली जैसे आधुनिक ताकतवर देश भी तबाही के कगार पर पहुंच गए हैं। जब इंसान ही नहीं बचेंगे तो, धन दौलत बैंक टकसाल का क्या होगा। कोरोनावायरस और विश्व सिनेमा पर देश के जाने - माने फिल्म समीक्षक अजीत राय का आलेख - 

कोरोनावायरस और विश्व सिनेमा​

कोरोनावायरस के खतरे और इससे लड़ने की कोशिशों के बीच यहां कम से कम  तीन फिल्मों की चर्चा की जा सकती है। पुर्तगाल के नोबेल पुरस्कार विजेता (1998) लेखक जोजे सारामागो  (16 नवंबर 1922 - 18 जून 2010) के उपन्यास " ब्लाइंडनेस" (1995) पर ब्राजील के फरनांडो मिरेल्लेस की इसी नाम से 2008 में बनी हालीवुड की फिल्म, दक्षिण कोरिया के मशहूर फिल्मकार किम कि डुक की " ह्यूमन, स्पेस, टाइम एंड ह्यूमन" और मध्य प्रदेश के पिछड़े इलाके बैतुल के कारण कश्यप की फिल्म ' दुनिया खत्म होनेवाली है ।' 
               

फरनांडो मिरेल्लेस की फिल्म " ब्लाइंडनेस" (2008) से 14 मई 2008 को 61 वें कान फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत हुई थी। जोजे सारामागो ने दस सालों तक अपने उपन्यास पर फिल्म बनाने की अनुमति इसलिए नहीं दी थी क्योंकि उनको डर था कि फिल्म बनने के बाद उपन्यास का लोकेल सार्वजनिक हो जाएगा। बाद में वे इसी शर्त पर राजी हुए कि निर्देशक इसे गुप्त रखेंगे। फिल्म में एक जापानी पेशेवर युवक कार चलाते चलाते शहर के भीड़ भरे चौराहे पर अचानक किसी वायरस का शिकार होकर अंधा हो जाता है। वह आंखों के डाक्टर के क्लिनिक में जाता है जहां उसे भर्ती कराया जाता है। दूसरे दिन वह डाक्टर भी अंधा हो जाता है।  धीरे धीरे यह बीमारी बढ़ने लगती है। सरकार शहर से बाहर एक अस्थायी जेल बनाकर अंधे लोगों को रखती जा रही है। धीरे धीरे सारा शहर ही अंधा हो जाता है। अंधापन जल्दी ही एक विकट महामारी का रूप ले लेता है और देखते देखते सारा देश ही अंधा हो जाता है। अब चूंकि आप देख ही नहीं सकते तो आपके लिए सोना चांदी, हीरे-जवाहरात, महंगी कारें, ऐशो आराम की भव्य चीजें बेकार हो जाती है। अंधेपन की इस महामारी में अधिकतर लोग दूसरों के प्रति अमानवीय हो जाते हैं। डाक्टर ( मार्क रफालो ) की पत्नी ( जुलियन मूर) ही अकेले ऐसी है जो देख सकती है। जब पुलिस उसके पति को अस्थायी जेल में ले जाने आती है तो वह भी अंधे होने का नाटक करते हुए साथ जाती है। फिर हम लूट, बलात्कार और हत्या की शर्मशार करने वाली घटनाओं की लंबी कतार देखते हैं। हर शहर का यहीं हाल है। सरकार अंधेपन की महामारी के शिकार नागरिकों को मदद पहुंचाने के बदले महामारी को फैलने से रोकने के लिए अमानवीय और क्रूर कदम उठाती जाती है और एक दिन सारा देश अंधा हो जाता है। डाक्टर की पत्नी दिन रात इस महामारी के शिकार लोगों के इलाज में जुटी हुई है। किसी तरह वह अपने पति के साथ कुछ लोगों को जेल से बाहर निकालने में सफल होती है। बाहर आकर वह देखती है कि सारा शहर बर्बाद हो चुका है। एक सभ्यता नष्ट हो चुकी है। वह जैसे तैसे उन लोगों को एक अपार्टमेंट में लाती है। एक नया परिवार बनाती है और अचानक एक खुशनुमा सुबह जापानी युवक की आंखें ठीक हो जाती है। फिर धीरे-धीरे सभी की आंखों में रौशनी वापस लौटती है। अंधे होने और ठीक होने के बीच फिल्म एक नरक से गुजरती है जहां संकट में इंसान जानवर से भी बदतर हो चुका है। जैसे ब्रिटिश हिंदी लेखक तेजेंद्र शर्मा की कहानी " काला सागर " में विमान दुर्घटना के बाद हिंदुस्तानी लोग मृत यात्रियों को लूटने में लग जाते हैं।

 दुनिया खत्म होनेवाली है तो आप क्या करेंगे?  
यदि आपको पता चल जाए कि अगले सात दिन बाद दुनिया खत्म होनेवाली है तो आप क्या करेंगे?  और यह खबर विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी अंतरिक्ष शोध केंद्र नासा  के हवाले से प्रसारित हो। आप जीवन के सारे जोड़ तोड़ छोड़ कर मरने से पहले सच्चे इंसान का जीवन जीना चाहेंगे । मध्य प्रदेश के पिछड़े इलाके बैतुल के कारण कश्यप की फिल्म ' दुनिया खत्म होनेवाली है ' में  एक गाँव में लोगों को जैसे ही पता चलता है कि दुनिया खत्म होनेवाली है तो सबका जीवन अचानक बदलने लगता है। चोर चोरी करना बंद कर देता है तो साहूकार इमानदार बन जाता है।  पति अपनी पत्नियों के प्रति उदार हो जाते है तो दूसरे पैसों के पीछे भागना बंद कर देते है। 
दक्षिण कोरिया के मशहूर फिल्मकार किम कि डुक की फिल्म " ह्यूमन स्पेस टाइम एंड ह्यूमन "  (2018)में एक बंदरगाह से अलग अलग तरह की सवारियों से खचाखच भरा विशाल जहाज रवाना होते ही रास्ता भटककर समुद्र में खो जाता है। जहाज पर सवार लोग छुट्टियां मनाने की गरज से आएं हैं। शुरू शुरू में तो वे काफी मौज मस्ती करते हैं पर जैसे ही पता चलता है कि जहाज रास्ता भटककर समुद्र में खो गया है और राशन पानी कुछ दिनों में खत्म हो जाएगा तो सब डर जाते हैं। सबको अपनी मृत्यु दिखाई देने लगती है। उस जहाज पर देश का राष्ट्रपति और उसका बेटा, हनीमून मनाने आए कई जोड़े, कुछ लूटेरे बदमाश, सेना के जवान और आम नागरिक सवार हैं। फिर शुरू होत है एक दूसरे को लूटने, मारने और बलात्कार का घिनौना खेल। धीरे धीरे राशन पानी सब खत्म, बंदूक पिस्तौल की गोली खत्म, गोला बारूद खत्म। उसके बाद लोग एक दूसरे को मारकर खाने लगते हैं। जब जहाज भटकता हुआ एक अनजाने टापू पर लगता है तो हम देखते हैं कि  केवल बलात्कार से गर्भवती एक औरत जीवित है। 


ये तीनों फिल्में बताती है कि संकट में इंसान जानवर से भी ज्यादा भयानक हो जाता है। हमारी चमक दमक और ऐशो आराम वाली सभ्यता मूल्य विहीन हो चुकी है। अब मानवता को खत्म करने के लिए परमाणु बमों की जरूरत नहीं है, एक वायरस ही काफी है।

 

(लेखक प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक हैं. देश भर के अखबारों में फिल्म, नाटक, कला और साहित्य पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं. इनका यह लेख मूलतः प्रभात खबर में प्रकाशित.) 

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डिस्क्लेमर - लेख का उद्देश्य आपतक सिर्फ सूचना पहुँचाना है. किसी भी औषधि,थेरेपी,जड़ी-बूटी या फल का चिकित्सकीय उपयोग कृपया योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के दिशा निर्देश में ही करें।
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