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आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा अपने आप में एक साधना

By NirogStreet Desk| posted on :   07-Jan-2019| NirogStreet News

मथुरा। संस्कृति आयुर्वेदिक मेडिकल काॅलेज में आज वैदिक मंत्रोच्चार, हवन-पूजन और उपनयन संस्कार के साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा सत्र का शुभारम्भ हुआ। इस अवसर पर प्रधानाचार्य सुनील वर्मा ने छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज के समय में समाज को निरोगी रखना युवा पीढ़ी का दायित्व है। आज देश के पास सिद्ध वैद्यों की बहुत कमी है, ऐसे में आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा का महत्व और बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेदिक चिकित्सा शिक्षा अपने आप में एक साधना है। आप लोग सिद्ध वैद्य बनकर समाज को निरोगी रख सकते हैं।

उप-कुलाधिपति राजेश गुप्ता ने अपने संदेश में शांतिगिरि आश्रम और संस्कृति यूनिवर्सिटी के बीच हुए अनुबंध को आयुर्वेदिक चिकित्सा के क्षेत्र में मील का पत्थर निरूपित करते हुए कहा कि इससे न केवल ब्रजवासियों को स्वस्थ रहने में मदद मिलेगी बल्कि छात्र-छात्राओं को पढ़ाई के साथ ही चिकित्सा विशेषज्ञों के सान्निध्य का लाभ भी मिलेगा। श्री गुप्ता ने कहा कि कोई भी छात्र साधना के बिना सिद्ध वैद्य नहीं बन सकता लिहाजा हमारा प्रयास है कि संस्कृति आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज एण्ड हास्पिटल में जो भी छात्र-छात्राएं तालीम के लिए आए हैं, वे अपनी अंतर दृढ़ता और सेवाभावना से ब्रज ही नहीं पूरे देश में सिद्ध वैद्य के रूप में अपनी पहचान बनाएं।

इस अवसर पर ओ.एस.डी. मीनाक्षी शर्मा ने नए विद्यार्थियों को बताया कि संस्कृति यूनिवर्सिटी भारतीय चिकित्सा प्रणाली को प्रतिष्ठापित करने को पूरी तरह प्रतिबद्ध है। ब्रजवासियों को आयुर्वेदिक चिकित्सा तथा सिद्धा प्रणाली के जरिये निरोगी रखने के लिए संस्कृति यूनिवर्सिटी ने शांतिगिरि आश्रम से अनुबंध किया है। शांतिगिरि आश्रम केरल की जहां तक बात है, यह अपनी सेवाभावना के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। संस्कृति आयुर्वेदिक मेडिकल कालेज एण्ड हास्पिटल समाज को योग, ध्यान, आध्यात्म और आयुर्वेदिक चिकित्सा के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने को कृत-संकल्पित है।

विभागाध्यक्ष डा. रामकुमार वर्मा ने कहा कि मथुरा धार्मिक नगरी होने के चलते यहां आयुर्वेदिक चिकित्सा का विशेष महत्व है। स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद चिकित्सा से बेहतर कुछ भी नहीं है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में हर बीमारी का इलाज है। कुछ बीमारियां ऐसी हैं जिनका आयुर्वेद में ही स्थायी इलाज सम्भव है। अधिकांश आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां और हर्बल शिशुओं की आम बीमारियों के मामलों में भी सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किये जा सकते हैं। विभागाध्यक्ष पंचकर्म डा. सुशील एम.पी. जोकि केरल के कोटकल से आए हैं, उन्होंने छात्र-छात्राओं को पंचकर्म क्या है, इसकी विस्तार से जानकारी प्रदान की। आचार्यद्वय विकास मिश्रा और देवनाथ द्विवेदी ने हवन-पूजन और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शिष्य उपनयन संस्कार सम्पन्न कराया। इस अवसर पर मेडिकल आफीसर डा. पवन गुप्ता, डा. संतोष कुन्तल, डा. मानषी अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

(मूलस्रोत - साभार लिजेंड न्यूज़)

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