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श्रावण (सावन) का महीना और आयुर्वेद!

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By Dr Abhishek Gupta | 07-Jul-2020

sawan ka mahina aur ayurveda

सावन का महीना आरम्भ हो चुका है, इस काल को वर्षा ऋतु के नाम से भी जाना जाता है। सावन के महीने से जुड़े कई सारे मिथ व भ्रांतियां हैं, आईये डॉ. अभिषेक गुप्ता से जानते हैं क्या है इनसे जुड़ी वैज्ञानिकता !
 
श्रावण का महीना - जुलाई से अगस्त के बीच के समय को माना जाता है, इस ऋतु में सूर्य का बल क्षीण और चन्द्रमा का बल पूर्ण होता है, वातावरण का स्वभाव स्निग्ध होता है और द्रव्यों में अम्ल रस की वृद्धि अधिक होती है, लोगों के शरीर में बल अल्प होता है व पित्त शरीर में धीरे-धीरे इकठ्ठा होता है और वात का प्रकोप होता है।   इस ऋतु से पहले आदान काल अर्थात गर्मी के कारण शरीर दुर्बल होता है व जठराग्नि भी कमजोर होती है, इसके बाद जब बारिश (बरसात) होती है तो जमीन से भाप निकलती है (जिससे वातावरण में नमी/humidity बढ़ जाती है) ऐसे में भूमिगत (जमीन से प्राप्त होने वाला) जल अम्ल विपाक का हो जाता है, यदि इसे पीने के लिए प्रयोग किया जाता है तो वह अग्नि को और अधिक कमजोर / मंद कर देता है! इन्हीं कारणों से इस मौसम में हमारा इम्यून सिस्टम भी बहुत कमजोर हो जाता है जिसके कारण शरीर को कई बीमारियां अपना शिकार बना लेती हैं। 
 
क्या करें और क्या न करें ! 
 
बरसात के मौसम में जहाँ एक ओर चारो तरफ हरियाली छा जाती है, वहीं दूसरी ओर बीमारियों का भी खतरा बना रहता है। इस मौसम में उत्पन्न होने वाले भूमिगत सब्जियों में वर्षा के कारण कीड़े-मकोड़े उत्पन्न होने लगते हैं इसलिए इस मौसम में बहुत सोच समझकर खाद्य पदार्थ खाने चाहिए, विशेषकर के हरी सब्जियां, दूध व मांस-मछली आदि। 
 
खाने योग्य आहार: पुराना अन्न जैसे - जौ, चावल, गेहूं आदि, अरिष्ट, उबला हुआ पानी, क्लेद नाशक व वात नाशक और मधु मिश्रित आहार।
 
करने योग्य विहार: वमन-विरेचन से शरीर का संशोधन करके बस्तिकर्म का सेवन इस मौसम में बहुत लाभदायक रहता है, आम पाचन व दीपन करवाकर इन क्रियाओं का सेवन हितकर रहता है। कॉकरोच-चूहे आदि से रहित घर में निवास, उबटन, सुगन्धित द्रव्यों और धूपन का प्रयोग। 
 
अपथ्य (बिल्कुल प्रयोग न करें) : नदियों का जल, दिन में सोना, अधिक पतला आहार, अधिक मैथुन, अधिक व्यायाम या पैदल चलना, ठन्डे वातावरण जैसे ए.सी. कूलर आदि में रहना। 
 
कुछ भ्रांतियां और वास्तविक तथ्य
 
भ्रांति - सावन में बैगन नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसे भगवान पर चढ़ाया जाता है !  
 
सच्चाई - इसे इस ऋतु में इसलिए नहीं खाया जाता क्योंकि सबसे जल्दी कीड़े बैगन में ही पड़ते हैं, जिसके कारण यह कई प्रकार की बीमारियों का वाहक बन जाता है, इस कारण ही संभवतः इसे पहले के लोगों ने भगवान से जोड़ दिया होगा, जिससे वे इसका सेवन करके रोग ग्रस्त न हो जायें। 
 
भ्रांतियां और आयुर्वेदिक/वैज्ञानिक दृष्टिकोण 
 
शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से भगवान प्रसन्न होते हैं! 
 
सच्चाई: शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परम्परा इसलिए आरम्भ हुई क्योंकि पहले के समय में दूध ही मुख्य आहार था, दूध से बने पदार्थ ही लोग ज्यादा खाते थे, आज भी बहुत बड़े हिस्से में लोग दूध से बने पदार्थों का ही सेवन करते हैं, वर्षा ऋतु या सावन के मौसम में हरी सब्जियों या घास आदि में कीड़े-मकोड़े ज्यादा उत्पन्न होते हैं व अम्ल विपाक भी अधिक बढ़ जाता है, जब पशु ऐसे आहार का सेवन करेगा तो निश्चित ही उसका दूध भी दूषित हो जाता है, साथ ही हमारे देश में भैंस का दूध अधिक पिया जाता है जो अग्नि को मंद करता है ऐसे में उस दूषित दूध का सेवन करने से कई तरह के रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है, और यदि यह दूध जानवरों के बच्चे अधिक पियें या उन्हें दुहा न जाये तो कई तरह के रोग उनको भी हो सकते हैं, ऐसे दूध को निकालकर फेंका भी नहीं जा सकता ऐसे में इस तरह के दूषित दूध को सावन का महीना होने के कारण भगवान शिव पर चढ़ाया जाने लगा!! 
 
इस कार्य को संभवतः यह कहकर प्रचारित कर दिया गया की शिवलिंग पर दूध चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं जो एक अलग तरह की परंपरा बन गई। यदि किसी व्यक्ति की अग्नि अच्छी है और दूध देने वाले पशु ने शुद्ध आहार का सेवन किया है तो निश्चित ही इसे सेवन कर सकते हैं और ऐसे शुद्ध दूध को शिवलिंग पर चढ़ाने की भी आवश्यकता नहीं है, भोलेनाथ तो आपके पानी से भी प्रसन्न हो जायेंगे ।
 
सावन में मांस-मछली और प्याज-लहसुन खाना वर्जित क्यों? 
 
सच्चाई: सावन के महीने मांस और मछली खाने और प्याज-लहसुन का सेवन करने की मनाही इसलिए नहीं होती क्योंकि उससे पाप बढ़ता है। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि यदि आप इस मौसम में अपनी अग्नि बेहतर करना चाहते हैं व आध्यात्म से जुड़ना चाहते हैं तो तामसिक प्रवृत्ति वाले भोजनों से अध्यात्म के मार्ग में बाधा आती है व ऐसे आहार गुरु होने के कारण अग्नि भी कमजोर करते है, जिससे कई तरह के उदर सम्बंधित रोगों की उत्पत्ति होती है। इतना ही नहीं मांस खाने से उनमें मौजूद बैक्‍टीर‍िया और कीटाणु से भी बीमारी हो सकती है। इसके अलावा एक और तथ्य यह है कि सावन माह में मछल‍ियों के ल‍िए प्रजनन का समय होता है इसल‍िए इस समय मछल‍ियों का शिकार करना और खाना वर्जित होता है।
consult with ayurveda doctor.
डिस्क्लेमर - लेख का उद्देश्य आपतक सिर्फ सूचना पहुँचाना है. किसी भी औषधि,थेरेपी,जड़ी-बूटी या फल का चिकित्सकीय उपयोग कृपया योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के दिशा निर्देश में ही करें।
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