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आयुर्वेद के अनुसार तुलसी के फायदे और नुकसान हिंदी में - Ayurveda ke Anusar Tulsi ke Fayde aur Nuksan in Hindi

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By NS Desk | 19-Mar-2021

Tulsi ke Fayde aur Nuksan in Hindi

तुलसी का परिचय - Introduction of Tulsi in Hindi

तुलसी को हिंदू धर्म में एक धार्मिक पौधा माना जाता है और इसे ‘पवित्र तुलसी’ के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी माता भगवती के अवतार के रूप में देवी तुलसी बन कर धरती पर अवतरित हुई थीं। हिंदू संस्कृति में अनेक हिंदू लोग किसी विशेष पात्र या गमले आदि में तुलसी के पौधे को अपने घरों के सामने लगाकर रखते हैं।

तुलसी की उत्पत्ति उत्तर-मध्य भारत में हुई मानी जाती है। यह अत्यंत प्राचीन औषधि है तथा अपनी विशेष उपचारात्मक प्रकृति के कारण सदा से ही आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर इस्तेमाल होती रही है। इसके भीतर मौजूद अनेक औषधीय गुणों की वजह से ही आयुर्वेद में इसे ‘प्रकृति की जननी औषधि’ ( मदर मेडिसन ऑफ नेचर) अथवा ‘औषधियों की रानी’ की संज्ञा दी जाती है। तुलसी खांसी और जुकाम की अत्यंत शक्तिशाली व सामान्य औषधि मानी जाती है क्योंकि यह रोगाणुरोधी, सूजनरोधी, कफनिवारक, खांसी तथा एलर्जी में राहत देने वाले तत्वों से समृद्ध होती है। यदि इसका सेवन शहद से किया जाए तो यह प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और हमें विभिन्न रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।

तुलसी की चाय का सेवन भी फायदेमंद होता है। यह तनाव को कम करता है तथा शरीर को खास आराम या शांति का आभास कराता है। तुलसी का नियमित सेवन करने से पाचन तंत्र में सुधार आता है तथा साथ ही वज़न कम करने में मदद भी मिलती है। एक एंटीऑक्सीडेंट तथा हैप्टोप्रोटेक्टिव घटक होने के कारण तुलसी लिवर की क्षति से भी हमारी रक्षा कर सकती है। तुलसी का सेवन मधुमेह के दोनों प्रकार के रोगियों के लिए अच्छा रहता है क्योंकि यह इंसुलिन के स्राव को बढ़ा कर रक्त में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करती है। इसके साथ ही यह इंसुलिन की संवेदनशीता को भी बढ़ाती है और अग्नाशय की क्षति से बचाव करती है।
 
तुलसी का इस्तेमाल कुछ गंभीर रोगों के उपचार के लिए भी किया जा सकता है,जैसे तंत्रिका विकार, तनाव, चिंता, यादाश्त की कमजोरी आदि। अनेक शोध यह भी साबित करते हैं कि कैंसर के मामले में भी तुलसी का सकारात्मक असर देखने को मिलता है। इसमें उपस्थित ग्लूटेथिओन को स्वामी प्रतिऑक्सीकारक यानी मास्टर एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है जो अन्य प्रतिऑक्सीकारकों की कार्य प्रणाली में सुधार लाने का काम भी करता है।
तुलसी को वैज्ञानिक तौर पर ओसिमम टेनुइफलोरम या ओसिमम सेंक्टम के नाम से जाना जाता है। भारत के विभिन्न भागों में इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है,जैसे- देवदुंदुभी, शुल्भा, गौरी, तुलसी, होली बेसिल, वृंदा, कृष्णामूल, श्रीतुलसी आदि।
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आयुर्वेदिक उपचार में तुलसी के उपयोग के फायदे - Benefits of Using Tulsi in Ayurvedic Treatment in Hindi

1. साधारण जुकाम 
आयुर्वेद- आयुर्वेद में साधारण जुकाम को कफ दोष तथा कमजोर पाचन तंत्र का परिणाम माना जाता है। कमजोर पाचन तंत्र के कारण शरीर में अपचित या विषैला भोजन आम के अवशेष के तौर पर जमा हो जाता है। यही आम लार के रूप में श्वसन तंत्र में पहुंचकर जुकाम या खांसी की वजह बनता है। तुलसी में गजब की दीपन शक्ति होती है अथवा यह क्षुधावर्धक, पाचक अग्नि को बढ़ाने वाली और कफ का निवारण करने वाली अनूठी औषधि है। अपने इन्हीं गुणों के कारण यह शरीर में आम के संचय को कम करती है तथा शरीर से अतिरिक्त लार को मुक्त करने में मदद करती है।

10-12 तुलसी की पत्तियां लें तथा उन्हें 7-8 काली मिर्च व एक चम्मच पीसी हुई अदरक में मिलाकर पानी में उबाल लें। इसे लगभग दस मिनट तक उबालें तथा इसमें एक चुटकी काला नमक डालें व स्वाद के लिए आधा नींबू निचोड़ लें। इसे ठंडा होने के लिए रख दें। उसके बाद छानकर गरम-गरम पी लें। सर्दी जुकाम व खांसी से अच्छी राहत मिलेगी।

2. श्लैष्मिक ज्वर या इन्फ्लूएंजा में तुलसी के फायदे
आयुर्वेद- आयुर्वेद में इन्फ्लूएंजा को वात श्लैष्मिक ज्वर के रूप में देखा जाता है। आयुर्वेद के मुताबिक़ इन्फ्लूएंजा शरीर में त्रिदोष यानी वात,पित्त व कफ दोष की उत्पत्ति का नतीजा होता है। तुलसी इन तीनों प्रकार के दोषों का नाश करती है तथा कफ का दोष तो यह और भी अधिक प्रभावी ढंग से मिटाती है। यह अपनी रासायनिक या उपचारात्मक प्रकृति के फलस्वरूप कफ दोष का अति शीघ्र निराकरण कर देती है। यह आपकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है और रोगों से लड़ने की शक्ति देती है।

10-12  तुलसी की पत्तियां लें तथा उन्हें 7-8 काली मिर्च व एक चम्मच पिसी हुई अदरक के साथ मिलाकर पानी में उबाल लें। इन्हें  लगभग दस मिनट तक उबालें तथा फिर इसमें एक चुटकी काला नमक व स्वाद के लिए आधा नींबू निचोड़ लें। अब आग से उतार लें व ठंडा होने के लिए रख दें। इसके बाद इसे छानकर गरम-गरम पी लें। यह इन्फ्लूएंजा के उपचार में काफी मददगार साबित होगा। तुलसी में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के अनूठे गुण मौजूद होते हैं और यह विषाणु जनित संक्रमण से बचाव में काफ़ी मददगार साबित होती है। यह एंटीपाइराइटिक तथा डायफोरेटिक तत्वों के रूप में समृद्ध होती है। 

3. दमा के रोग में तुलसी के फायदे 
आयुर्वेद- आयुर्वेद में अस्थमा को एक एक श्वास रोग की संज्ञा दी जाती है और इसका मुख्य कारण वात की गड़बड़ी तथा कफ दोष को माना जाता है। इन्हीं दोनों दोषों की वजह से फेफडों से संबद्ध श्वसन मार्ग में श्लेष्मा जमा हो जाती है और उनमें अवरुद्ध पैदा हो जाने से सांस लेने में दिक्कत आने लगती है। तुलसी में वात व कफ की गड़बड़ी को ठीक करने के समस्त गुण मौजूद पाए जाते हैं और इसी कारण यह शरीर में जमा अतिरिक्त श्लेष्मा को मुक्त करके श्वसन मार्ग की रुकावट को दूर कर देती है तथा परिणामस्वरूप अस्थमा से आराम मिलता है।

तुलसी की पत्तियों के रस को एक चम्मच शहद में मिलाकर पीने से अस्थमा से राहत मिलती है। बेहतर परिणाम पाने के लिए दिनभर में इसका तीन या चार बार सेवन किया जा सकता है।

तुलसी का प्रतिरक्षित नियामक या प्रतिरोधक क्षमता को को बढ़ाने वाला गुण अस्थमा या दमा के उपचार में मदद करता है। इसका एलर्जी तथा सूजन रोधी गुण श्वसनीय निल या ब्रांकियल ट्यूब में निहित श्लेष्मा झिल्लियों की सूजन को कम करता है।

4. ज्वर में तुलसी के फायदे
आयुर्वेद-
आयुर्वेद के अनुसार ज्वर शरीर का बढ़ा हुआ तापमान होता है तथा यह स्थिति वात (शारीरिक ऊर्जा) की गड़बड़ी की वजह से पैदा होती है। तुलसी ज्वर का सफलतापूर्वक उपचार कर सकती है क्योंकि इसमें वात को संतुलित करने व शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के समस्त गुण मौजूद पाए जाते हैं। इसकी रासायनिक या उपचारात्मक प्रकृति प्रतिरोधकता को बढ़ा कर शरीर को संक्रमण से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है और इसी कारण ज्वर  में आराम मिलता है।

आयुर्वेद के अनुसार ज्वर के उपचार के लिए तुलसी का काढ़ा बनाकर पी सकते हैं। तुलसी का काढ़ा बनाने के लिए 10-15 तुलसी की पत्तियां लें तथा उन्हें 7-8 काली मिर्च व एक चम्मच पिसी हुई अदरक के साथ मिलाकर पानी में उबाल लें। इसे दस मिनट तक उबालें तथा फिर इसमें चुटकी भर काला नमक  व स्वाद के लिए आधा नींबू निचोड़ लें। अब इसे एक मिनट तक ठंडा होने दें तथा फिर गरम-गरम पी लें। ऐसा करने से ज्वर में आराम मिलेगा।
तुलसी अत्यंत शक्तिशाली औषधि है और इसमें मौजूद बायोएक्टिव तत्व प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने वाले तथा सूक्ष्मजीव रोधी होते हैं। तुलसी का सेवन प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाता है तथा इसकी एंटीपाइराइटिक व डायफोरेटिक गतिविधि ज्वर से राहत दिलाने में सहायक होती है।

5. तनाव में तुलसी के सेवन का फायदा 
आयुर्वेद-
हमारी शारीरिक ऊर्जा या वात तनाव को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सामान्यतः वात की गड़बड़ी ही तनाव से संबंधित समस्याओं,जैसे कि इंसुमोनिया,चिड़चिड़ाहट,भय आदि का कारण बनती है। तुलसी का सेवन अपने वात दोष नाशक गुण के कारण तनाव को कम करता है।
तनाव से छुटकारा पाने के लिए तुलसी का काढ़ा पीना फायदेमंद रहता है। तुलसी का काढ़ा बनाने के लिए इसकी 10-12 पत्तियां लेकर उन्हें दो कप पानी में उबालें तथा उसके आधा रह जाने तक उबालते रहें। अब इसे सामान्य तापमान पर आने तक ठंडा करें  और  फिर छान लें। अब आप इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर कर पी सकते हैं। इसके पीने से तनाव में आराम मिलेगा।
आजकल तनाव के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं तथा कई बार यह ऐसी गंभीर स्थिति धारण कर लेता है कि इस पर काबू पाना मुश्किल हो जाता है। तनाव भले ही शारीरिक, रासायनिक या फिर जैविक ही क्यों न हो एडाप्टोजेनिक औषधियां उस पर आसानी से नियंत्रित कर लेती हैं। तुलसी एक एडाप्टोजेनिक औषधि है तथा इसके इस्तेमाल से तनाव का उपचार हो जाता है।
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6. डायबिटिज मेलिटस में तुलसी का लाभ
आयुर्वेद-
आयुर्वेद में डायबिटिज को मधुमेह के नाम से जाना जाता है और इसे वात दोष एवं कमजोर पाचन तंत्र का परिणाम माना जाता है। कमजोर पाचन तंत्र के कारण खाना सही से नहीं पचता तथा शरीर में आम जमा हो जाता है। इसे आप अपचित विषैले भोजन अवशेष भी कह सकते हैं। शरीर में इसके जमा होने से अग्नाशय की कोशिकाओं का कार्य व्यवहार  बाधित हो जाता है और फलस्वरूप इंसुलिन की  कार्य प्रणाली बिगड़ जाती है। तुलसी की दीपन या क्षुधावर्धक व पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली  प्रकृति वात दोष का निराकरण कर देती है जिससे पाचन प्रणाली मजबूत होती है और शरीर से आम  निकल जाता है। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप रक्त में उपस्थित  शर्करा व ग्लूकोज का उच्च स्तर नियंत्रित हो जाता है और डायबिटिज में आराम मिलता है।

तुलसी डायबिटिज टाइप 1 व टाइप 2 दोनों में ही लाभ पहुंचाती है। यह डायबिटिज तथा उससे जुड़ी अन्य समस्याओं में आराम देती है। टाइप 1 के मरीजों में शरीर इंसुलिन नहीं बनाता है या बहुत ही कम बनाता है। इसके विपरीत टाइप 2 के डायबिटिज रोगियों का शरीर इंसुलिन को लेकर कोई प्रतिक्रिया दर्शाता ही नहीं है। इन दोनों ही परिस्थितियों में रोगी के शरीर में शुगर लेवल बहुत अधिक बढ़ जाता है।

7. लिवर के रोग में  तुलसी के फायदे
आयुर्वेद-
आयुर्वेद के अनुसार लिवर की गड़बड़ी का कारण कमजोर पाचक अग्नि तथा वात एवं  पित्त दोष बनते हैं । तुलसी अपनी दीपन या क्षुधावर्धक व पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली प्रकृति के फलस्वरूप वात व पित्त का दोष तो मिटाती ही है साथ ही पाचन में सुधार भी लाती है। पाचन मजबूत होने से भोजन अच्छे से पचता है और इसी कारण शरीर में आम जमा नहीं हो पाता। इस तरह  लिवर की कोशिकाओं का विषैले तत्वों से बचाव होता है। तुलसी का रासायनिक व उपचारात्मक गुण लिवर को सुरक्षित रखने में खास योगदान देता है। तुलसी एक हैप्टोप्रोटेक्टिव घटक है। अपनी विषाणु रोधी, सूजन रोधी तथा प्रति-ऑक्सीकारक प्रकृति के कारण वायरल हैपेटाइटिस में मददगार साबित होती है।

8. ह्रदय रोगों में तुलसी के फायदे 
आयुर्वेद-
आजकल की जीवन-शैली में बिगड़े हुए खान -पान के कारण रक्त में कोलेस्ट्रॉल के स्तर तथा रक्त दबाव का बढ़ना सामान्य बात हो गयी है। यही समस्याएं ह्रदय से संबंधित विभिन्न प्रकार के रोगों का कारण बनती हैं। तुलसी शरीर में वात दोष को मिटाकर तनाव के स्तर को कम करती है तथा यह पाचक अग्नि को बढाकर पाचन को मजबूत करती है और इसी के परिणामस्वरूप रक्त में उच्च कोलेस्ट्रॉल लेवल नियंत्रित हो जाता है। अतः कह सकते हैं कि तुलसी ह्रदय रोगों के खतरे को कम करती है।

तुलसी में तनाव को हरने वाले गुण प्रचुर मात्रा में मौजूद पाए जाते हैं और  इसी कारण यह तनाव से जुड़े ह्रदय रोगों में अच्छा आराम पहुंचाती है। तनाव की अति से ह्रदय की मांसपेशियों को क्षति पहुंचाती है और इसी कारण ह्रदय से संबंधित कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं।

9. मलेरिया की बीमारी में तुलसी के फायदे 
आयुर्वेदिक उपचार में तुलसी को मलेरिया के  इलाज के लिए एक सामान्य औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। तुलसी अपने मलेरिया रोधक गुणों के लिए जानी जाती है। इसमे मौजूद युजिनोल का सार मलेरिया में असरदार होता है। युजिनोल एक सक्रिय घटक के तौर पर जीवाणु संक्रमण तथा मलेरिया के लक्षणों को मिटाने में खास चिकित्सकीय असर दिखाता है। इसमें मच्छरों को दूर भगाने वाला या मच्छर प्रतिरोधक गुण भी मौजूद पाया जाता है। इसका बेहतर असर पाने के लिए इसकी पत्तियों का काली मिर्च के पाउडर में सेवन करना चाहिए।

10. डायरिया में तुलसी का लाभ
आयुर्वेद-
तुलसी का दीपन या क्षुधावर्धक तथा पाचन तंत्र को मजबूती देने वाला गुण डायरिया के उपचार में मदद करता है। तुलसी पाचक अग्नि को सुधारती है तथा पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है। इसी के परिणामस्वरूप डायरिया के इलाज में मदद मिलती है और साथ ही बार-बार के मल त्याग से राहत भी मिल जाती है।
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11. अनिद्रा में तुलसी के फायदे 
ऐसा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है जो यह बताता हो कि अनिद्रा रोग में तुलसी के सेवन से कोई लाभ पहुंचाता हो।
आयुर्वेद- आयुर्वेद के मुताबिक़ वात दोष के कारण तंत्रिका तंत्र अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है तथा इसी कारण व्यक्ति अनिद्रा रोग का शिकार बन जाता है। तुलसी आराम पहुंचाने वाली औषधि होती है तथा यह वात दोष को दूर अच्छी नींद लाने में मदद करती है।

12. दाद के इलाज में तुलसी के फायदे 
आयुर्वेद-
दद्रु ,खुजली तथा जलन आदि दाद के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएं हैं और कफ व पित्त की गड़बड़ी का नतीजा मानी जाती हैं। तुलसी का बाह्य तौर पर उपयोग कफ को नियंत्रित करता है तथा इसकी रुक्ष प्रकृति दाद के लक्षणों को समाप्त करने में मदद करती है। दाद पर होने वाले संक्रमण से बचने के लिए उस पर प्रतिदिन तुलसी रस का प्रयोग करना चाहिए। आप 2-3 तुलसी पत्तियों को नारियल के तेल में पीसकर पेस्ट बनाकर भी प्रभावित भाग पर लगा सकते हैं। इससे खुजली व जलन में आराम मिलता है। इस तरह का पेस्ट बच्चों पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

13. सिरदर्द में तुलसी के लाभ
आयुर्वेद-
शिरोनाल शोथ से उत्पन्न सिरदर्द को तुलसी आसानी से नियंत्रित कर सकती है। इसका मुख्य कारण वात एवं कफ दोष को माना जाता है तथा तुलसी इन दोनों प्रकार के दोषों का निराकरण करने वाली होती है। तुलसी कफ व वात दोष का निराकरण करने के साथ-साथ शिरोनाल शोथ के भारीपन तथा उसके संकुलन को भी कम करती है। किसी बड़े बरतन में तुलसी की पत्तियां पानी में उबाल लें तथा सिर पर तौलिया ढक कर उस पानी की भाप लें। दस-पंद्रह मिनट तक भाप लेने से सिरदर्द में आराम मिल जाएगा।

14. जानवर के काटने पर तुलसी के लाभ 
आयुर्वेद- तुलसी का बाह्य या भौतिक रूप से उपयोग किसी जानवर के काटने पर उपचार में अच्छी मदद करता है। तुलसी का उपचारात्मक गुण काटने के कारण बने घावों को भरने में मदद करता है। प्रभावित भाग को संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए उस पर तुलसी की पत्तियों का पेस्ट या तेल लगाना चाहिए।
किसी सांप या बिच्छू के काटने पर तुलसी द्वारा उसका उपचार करना संभव होता है। इसका सूजनरोधी गुण सूजन में आराम देता है तथा इसकी पीड़ाहारी प्रकृति दर्द से राहत प्रदान करती है।

15. कान के दर्द में तुलसी के फायदे
कान में दर्द के कई कारण हो सकते हैं,जैसे सूक्ष्मजीवी संक्रमण, एलर्जी संबंधित प्रतिक्रिया या फिर किसी प्रकार की आंतरिक क्षति आदि। तुलसी सूक्ष्मजीव रोधी होती है तथा इसी कारण कान में उनकी वृद्धि पर रोक लगाती है। इसकी सूजनरोधी व पीड़ाहारी प्रकृति दर्द एवं सूजन में आराम पहुंचाती हैं।
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आयुर्वेद के अनुसार तुलसी उपयोग के विविध तरीके - Different methods of Tulsi Usage According to Ayurveda in Hindi

तुलसी कैपसूल के रूप में 
तुलसी कैपसूल के रूप में भी उपलब्ध पायी जाती है। 1-2 कैपसूल को प्रतिदिन पानी के साथ लिया जा सकता है। तुलसी के कैपसूल का उपभोग किसी खाद्य अनुपूरक या इम्युनिटी बुस्टर के रूप में भी कर सकते हैं।

तुलसी की गोलियां 
तुलसी की गोलियां भी मिलती हैं। दिन में 1-2 गोलियों के सेवन की सलाह दी जाती है। इनका उपभोग इम्युनिटी बुस्टर या शरीर में विटामिनों या खनिजों की क्षतिपूर्ति करने वाले अनुपूरक के रूप में भी कर सकते हैं।

तुलसी पाउडर
तुलसी की पत्तियों का पाउडर भी मिलता है। एक चौथाई या आधा चम्मच तुलसी पाउडर को पानी के साथ फाकी के तौर पर लिया जा सकता है।

तुलसी ड्राप
तुलसी का सार या ड्राप के रूप में भी मिलता है। यह तुलसी की पत्तियों से प्राप्त गाढ़ा अर्क या सार होता है। यह काफी शक्तिशाली होता है तथा इसीलिए इसका सेवन करने से पूर्व इसमें पानी मिलाकर इसे पतला कर लेने चाहिए। दिन में एक या दो बार 1-2 तुलसी ड्राप्स को गुनगुने पानी में डालकर पीने से स्वस्थ लाभ प्राप्त होता है।

तुलसी की पत्तियों का प्रत्यक्ष सेवन
तुलसी की ताजा पत्तियों का प्रत्यक्ष रूप से सेवन भी किया जा सकता है। इन्हें चबाकर या निगल कर खाया जा सकता है। इसकी पत्तियों को निगलने का तरीका ज्यादा अच्छा माना जाता है। तुलसी की पत्तियों के सेवन से कोई नुकसान नहीं होता है। सुबह भोजन करने से पहले 5-6 पत्तियों को चबाकर खाना चाहिए।

तुलसी की चाय
तुलसी की 5-7 पत्तियों को डेढ़ कप पानी में डालकर दस मिनट तक उबालें तथा फिर छान लें। अपने स्वाद के अनुसार इसमें नींबू के रस की कुछ बूंदें भी डाल सकते हैं। इसे गरम-गरम पीने से सरदी-जुकाम में अच्छी राहत मिलती है।

शाही जीरा-तुलसी 
एक गिलास पानी में आधा चम्मच शाह जीरा लें और  उसमें 5-6 तुलसी की पत्तियां डाल लें। अब जब तक यह आधी मात्रा में शेष न बचे इसे उबालते रहें और इसकी आधी मात्रा रह जाने पर उबालना बंद कर दें। यह ज्वर के उपचार का खास तरीका है। दिन में दो बार एक-एक चम्मच पीने से ज्वर उतर जाता है।

तुलसी काढ़ा
सामान्य सर्दी-जुकाम में तुलसी के काढ़े का सेवन काफी लोकप्रिय आयुर्वेदिक उपचार माना जाता है। तुलसी का काढ़ा बनाने के लिए तुलसी की 15-20 पत्तियों को एक चम्मच पिसी हुई अदरक व 7-8 काली मिर्च के साथ मिलाकर पानी में उबाल लें। दस मिनट तक उबालने के बाद इसमें स्वाद के लिए  काला नमक डालें तथा आधा नींबू निचोड़ लें। फिर इस मिश्रण को ठंडा होने दें और गरम-गरम पी लें।

तुलसी का पानी
तुलसी के पानी को बेहतर ऐंटीबॉयोटिक  तथा एंटीऑक्सीडेंट माना जाता है। आधा कप तुलसी की पत्तियों को कूट-पीसकर उसमें दो कप पानी मिला लें। फिर पंद्रह मिनट तक उबालने के बाद पंद्रह ही मिनटों तक ठंडा होने दें। अब इसे छानकर पी लें। प्रतिदिन सुबह के समय पीना अच्छा रहता है।

तुलसी का सुगंधित तेल
तुलसी के तेल को नारियल के तेल के साथ मिलाकर सिर पर हल्की मालिश करनी चाहिए। सप्ताह में दो तीन बार करने से रूसी में बहुत फायदा मिलेगा।

तुलसी की पत्तियों का पेस्ट 
तुलसी की पत्तियों का शहद में तैयार किया गया पेस्ट मुहांसों तथा त्वचा के दाग-धब्बों के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसके इस्तेमाल से मुहांसों व सूजन दोनों से ही आराम मिलता है। यह जख्म आदि को भरने में भी मदद करती है।

तुलसी का टूथपेस्ट 
तुलसी को मुंह के स्वास्थ्य के लिए भी जाना जाता है। इसी कारण इसको टूथपेस्ट बनाने के लिए एक व्यावसायिक घटक के रूप में प्रयोग किया जाता है। आप तुलसी का टूथपेस्ट अपने घर पर ही तैयार कर सकते हैं। इसके लिए आपको एक चम्मच तुलसी पाउडर में आधा चम्मच सरसों का तेल मिलाना चाहिए।
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तुलसी उपयोग से संबंधित दुष्प्रभाव व सावधानियां - Side Effects and Precautions Related to Basil Use in Hindi

1. तुलसी रक्त में थक्के जमना कम करती है और इसी कारण रक्त लंबे समय तक बहता रहता है। अतः अगर शरीर में किसी तरह की रक्त स्राव की समस्या हो या फिर सर्जरी करवाई हो तो तुलसी के सेवन में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।
2. ऐसा व्यक्ति जो अत्यधिक संवेदनशील या एलर्जी से ग्रस्त होता है तुलसी उसके शरीर में एलर्जी से सम्बद्ध प्रतिक्रिया का कारण बन सकती है। अतः इस तरह के मामले में चिकित्सक से संपर्क करना अनिवार्य है।
3. अत्यधिक संवेदनशील त्वचा के मामले में तुलसी की शक्ति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से इसके जूस या पेस्ट को गुलाब जल या शहद में प्रयोग करने की सलाह दी जाती है।
4. तुलसी का सगंध तेल काफी अधिक गाढ़ा होता है और इसीलिए इसमें नारियल का तेल मिलाकर इसे पतला करके ही त्वचा पर इस्तेमाल करना चाहिए।
5. स्तनपान से संबंधित मामले में तुलसी को लेकर नाममात्र ही शोध हुए हैं। इसी कारण यह अनिवार्य बन जाता है कि इससे जुड़े मामलों में चिकित्सक से परामर्श लेने के बाद ही तुलसी का सेवन करना चाहिए।
6. तुलसी गर्भाशय के संकुचन का कारण बन सकती है। अतः इस अवस्था में तुलसी के सेवन से बचना चाहिए क्योंकि यह गर्भपात का कारण बन सकती है।
7. तुलसी के चिर उपयोग से कुछ दुष्प्रभाव सामने आते हैं,  जैसे हाइपोग्लाइसेमिया, एंटीसपर्ममैटोजेनिक या एंटीफ्रटिलिटी,लंबे रक्त स्राव की समस्या आदि। 
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तुलसी से संबंधित कुछ प्रश्नोत्तर - Tulsi Related FAQ's in Hindi

 

1 क्या हम तुलसी की पत्तियों को कच्चा चबा सकते हैं?
तुलसी की पत्तियों को कच्चा चबाने से किसी प्रकार की हानि नहीं होती है। तुलसी की पत्तियों को चबाना मुंह की सेहत के लिए अच्छा रहता है। मगर इसकी पत्तियों को निगलना चबाने से ज्यादा अच्छा माना जाता है।


2 क्या बेसिल तुलसी का समानार्थी है?
आयुर्वेद में तुलसी के उपचारात्मक गुणों को देखते हुए अनके चिकित्सक इसका रोगों के उपचार हेतु उपयोग करते हैं। हिंदू लोग तुलसी को पवित्र मानते हैं तथा इसका अनेक प्रकार से प्रयोग किया जाता है। जबकि बेसिल का कोई धार्मिक महत्व नहीं है तथा इसका प्रयोग मात्र एक सुगंधित घटक के रूप में किया जाता है। बेसिल तथा तुलसी दोनों एक ही परिवार से संबंध रखती हैं परंतु फिर भी दोनों पूर्णतः भिन्न होती है। बेसिल की पत्तियों में खास सुगंध होती है तथा इसका प्रयोग खाना पकाने में करते हैं।


3 तुलसी के पौधे को कितने पानी की आवश्यकता होती है?
तुलसी के पौधे को उचित वृद्धि करने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी की जरूरत होती है। इसकी अच्छी वृद्धि के लिए दिन में दो बार पानी देना चाहिए।


4 तुलसी का क्या धार्मिक महत्व है?
हिंदू धर्म में तुलसी को पवित्र पौधे का दर्जा दिया गया है और इसे धरती पर भगवती तुलसी के अवतार के रूप में देखा जाता है। हिंदू पुराणों के अनुसार देवी तुलसी भगवान विष्णु की महान उपासिका थीं।


5 क्या तुलसी के ड्राप का सेवन करने पहले मैं उसमें पानी मिला सकता हूं?
तुलसी की उष्ण तासीर तथा इसकी शक्तिमत्ता को देखते हुए इसके ड्राप में पानी मिलाकर सेवन करना उचित रहता है।
तुलसी का ड्राप काफी शक्तिशाली तथा गाढ़ा होता है और  साथ ही इसका स्वाद भी बहुत अधिक तेज या तीक्ष्ण भी होता है।


6 तुलसी का पानी सेहत के लिए अच्छा क्यों रहता है?
तुलसी का पानी शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा को सेहत प्रदान करने वाला माना जाता है। अपनी राहत पहुंचाने वाली प्रकृति के परिणामस्वरूप यह खास पोषण देने वाली औषधि मानी जाती है। तुलसी का पानी मुंह और आंखों के लिए स्वास्थ्यवर्धक समझा जाता है। यह प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है तथा हैप्टोप्रोटेक्टिव होने के कारण लिवर को स्वस्थ बनाता है तथा साथ ही इसकी कार्य क्षमता को सुधारता है। तुलसी की चाय या काफी से बेहतर इसका काढ़ा माना जाता है। यह किसी प्रकार के शारीरिक नुकसान का कारण नहीं बनता हैं ।


7 आयुर्वेद के मुताबिक़ आप तुलसी को कैसे वर्गीकृत करते हैं?
आयुर्वेद के अनुसार दो प्रकार की तुलसी पायी जाती है- कृष्णा तुलसी जो कि काली या गहरे रंग की होती है और रामा तुलसी जो कि हरे रंग की होती है। किन्तु दोनों ही प्रकार की तुलसी में समान रासायनिक तथा औषधीय गुण मौजूद पाए जाते हैं।


8 तुलसी यादाश्त को सुधारने में कैसे मदद कर सकती है?
अत्यधिक तनाव, पर्याप्त नींद न ले पाना तथा तंत्रिका तंत्र की कमजोरी ही यादाश्त की कमजोरी का कारण बनते हैं। तुलसी तनाव के स्तर को कम करने तथा वात की गड़बड़ी को ठीक करने में सक्षम होती है जिस कारण गहरी नींद आती है और यादाश्त की कमजोरी से राहत मिलती है। इसके रासायनिक गुण तंत्रिका तंत्र को मजबूत बनाते हैं तथा इस कारण भी यादाश्त पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

तुलसी यादाश्त को बढ़ाने या उसको बनाए रखने में मदद करती है। इसी के परिणामस्वरूप तनाव से मुक्ति मिलती है तथा यादाश्त में  सुधार आता है। तुलसी की शांत या आराम पहुंचाने वाली प्रकृति मस्तिष्क को शांति प्रदान करती है और इस कारण भी यादाश्त की कमजोरी दूर होती है।


9 क्या तुलसी विषैले रसायन से उत्पन्न क्षति में उपयोगी सिद्ध हो सकती है?
मानव शरीर को आक्सीडेटिव या ऑक्सीकरणीय  आक्रमण का खतरा हो सकता है और परिणामस्वरूप कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। तुलसी शरीर को इस तरह के रासायनिक नुकसान से बचा सकती है। तुलसी में मौजूद ग्लूटेथिओन एक ऐसा ऑक्सीडेंट होता है जो  कि अन्य ऑक्सीडेंट्स जैसे कि डिस्मुटेस व कैटलस की कार्य क्षमता में वृद्धि करता है। इस प्रकार तुलसी कोशिकाओं को फ्री-रेडिकल्स ऑक्सीडेटिव की वजह से होने वाली क्षति से बचाती है और  साथ ही विषैले तत्वों से मुक्ति भी दिलाती है।


10 क्या तुलसी रक्त स्राव की गड़बड़ी को ठीक कर सकती है?
नहीं, क्योंकि इस प्रकार की गड़बड़ी पर तुलसी का नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है। वैज्ञानिक मत के अनुसार तुलसी का सार रक्त में थक्के जमने की प्रक्रिया को धीमा करता है और इसी कारण रक्त स्राव बढ़ता है। अतः इस प्रकार की समस्या हो तो तुलसी का सेवन करने की पूर्णतः मनाही है।


11 क्या तुलसी एसिडिटी का कारण बन सकती है?
हां, तुलसी का अत्यधिक मात्रा में सेवन एसिडिटी का कारण बन सकता है,क्योंकि यह तासीर में अत्यधिक उष्ण अथवा गरम होती है। पहले से ही कमजोर पाचन वाले लोगों द्वारा इसका सेवन कई तरह की जटिलताएं पैदा कर सकती है।


12 हर रोज तुलसी के सेवन से क्या लाभ प्राप्त हो सकते हैं?
तुलसी अपने औषधीय गुणों के कारण प्राचीन काल से ही आयुर्वेदिक औषधि के तौर पर इस्तेमाल होती रही है। यह सामान्य सरदी-जुकाम की घरेलू औषधि है। यह एक अच्छी कफनिस्सारक भी है तथा संकुलन से राहत देती है। यह प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है एवं अस्थमा, श्वसनशोथ आदि के उपचार में योगदान देती है। यह वात-कफ जैसे दोषों को मिटाकर संक्रामक रोगों से बचाव करती है। यह पाचन तंत्र को सुधार कर जठर रोगों से बचाव भी करती है।
तुलसी का नियमित सेवन कई तरह की समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है। तुलसी में अनेक औषधीय गुण निहित पाए जाते हैं और यह सामान्य सरदी-जुकाम, खांसी, अस्थमा, फेफडों की समस्या, आमाशय तथा दिल से संबंधित समस्याओं व जीवाणु संक्रमण आदि से सफलतापूर्वक बचाव करती है। तुलसी यादाश्त की कमजोरी को भी दूर करती है।


13 तुलसी तनाव में कैसे मदद करती है?
आयुर्वेद के अनुसार तनाव वात दोष का परिणाम होता है और तुलसी शरीर में व्याप्त वात दोष के निराकरण में समर्थ होती है। अतः तुलसी वात की गड़बड़ी को ठीक करके तनाव से छुटकारा दिलाती है।
तुलसी रक्त चाप को नियंत्रित करता है तथा रक्त वाहिकाओं के तनाव को कम करता है। अन्य औषधियों की भांति तुलसी के दुष्प्रभाव भी नहीं होते हैं और इसीलिए इसे मानसिक सेहत या तनाव मुक्ति के लिए अच्छा माना जाता है।


14 क्या तुलसी के बीजों का प्रयोग वज़न घटाने के लिए कर सकते हैं?
तुलसी के बीजों को भोजन का बेहतर अनुपूरक माना जाता है और ये वज़न कम करने में अच्छा योगदान देते हैं। ये शरीर में कफ की गड़बड़ी को ठीक करते हैं और शरीर की विषाक्तता से छुटकारा दिलाते हैं। इसी वजह से शरीर में हल्कापन आता है तथा वज़न कम होता है।
तुलसी के बीजों का सेवन लंबे समय तक भूख नहीं लगने देता क्योंकि इनमें प्रचुर मात्रा में फाइबर पाया जाता है। शरीर द्वारा इस फाइबर को पचाने में काफी लंबा समय लगता है। तुलसी के बीजों को भोजन का अच्छा अनुपूरक माना जाता है क्योंकि इसका बीज पानी सोखने के बाद अपने आकार में 30 गुना तक बढ़ जाता है। अतः तुलसी के ये सभी गुण वज़न कम करने में मदद करते हैं।


15 क्या हम अच्छी सेहत के लिए तुलसी के पानी

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डिस्क्लेमर - लेख का उद्देश्य आपतक सिर्फ सूचना पहुँचाना है. किसी भी औषधि,थेरेपी,जड़ी-बूटी या फल का चिकित्सकीय उपयोग कृपया योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के दिशा निर्देश में ही करें।
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