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हाई ब्लडप्रेशर से बचना है तो आयुर्वेद के इन नियमों को माने

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By Ram N Kumar | 18-May-2019

हाइपरटेंशन , हाई ब्लडप्रेशर , उच्च रक्तचाप

- राम एन. कुमार

कहावत है कि चिंता चिता के समान है। यह हमारे तन और मन दोनों को प्रभावित करता है और कई बीमारियों के लिए संभावनाओं के द्वार खोलता है। हाइपरटेंशन या उच्च रक्तचाप (high blood pressure) भी ऐसी ही एक बीमारी है। हालाँकि गलत खान-पान, मोटापा और अव्यवस्थित जीवनशैली की वजह से भी हाइपरटेंशन होता है लेकिन अवचेतन मन पर पड़ने वाला अनावश्यक बोझ हाइपरटेंशन के होने या न होने में बहुत अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही वजह कि गुस्सा आने पर अक्सर आपके दोस्त और परिवार वाले समझाते हैं कि गुस्सा मत करो, बीपी बढ़ जाएगा। दूसरी तरफ चिकित्सक भी हमेशा तनाव और चिंता से दूर रहने की सलाह देते हैं। वैसे ब्लडप्रेशर एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है जो रक्त के प्रवाह में अहम् भूमिका निभाता है। लेकिन जब यह प्रेशर कम या ज्यादा होता है तो हाई या लो ब्लड प्रेशर की समस्या खड़ी होती है।

भागदौड़ और तनावग्रस्त जीवन की वजह से हाइपरटेंशन आजकल आम बीमारी हो गयी है। पहले यह सिर्फ व्यस्कों को होता था लेकिन आजकल कम उम्र के बच्चे भी इसके शिकार हो रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक़ 60 की उम्र पार करने के बाद 50% लोग इस बीमारी की गिरफ़्त में आ जाते हैं। हाई बीपी का सबसे बड़ा प्रभाव हृदय पर पड़ता है और हृदय रोग होने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है। वैसे इसे सायलेंट किलर भी कहते हैं। इसकी शुरुआत का मतलब है, कई दूसरी बीमारियों को न्योता देना। लंबे समय तक हाइपरटेंशन रहने की वजह से शरीर के दूसरे अंगों जैसे ह्रदय, किडनी और आँखों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। लेकिन आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति द्वारा बताए गए तीन नियमों को जीवन में उतारकर हाइपरटेंशन के खतरे को कम किया जा सकता है। शांत चित्त, नियमित व्यायाम और उचित खानपान से हाई ब्लडप्रेशर को नियंत्रित किया जा सकता है. आइये जानते हैं कि आयुर्वेद की मदद से कैसे हाइपरटेंशन से बचा या उसे नियंत्रित किया जा सकता है।

1- मन की शांति : आयुर्वेद के अनुसार मन बहुत ताकतवर होता है और जिसने इसपर काबू पा लिया वह सारे रोगों से दूर रहता है। इसलिए आयुर्वेद में मन की चिकित्सा के लिए अलग से 'सत्वावजय चिकित्सा' का प्रावधान है जिसके द्वारा मन की समस्याओं को सुलझाया जाता है। इसे आयुर्वेदिक साइकोथेरेपी भी कह सकते हैं। उच्च रक्तचाप की बड़ी वजह मन की अशांति है। अशांत मन की वजह से ही चिंता, चिड़चिड़ापन और गुस्साने की प्रवृति पनपती और समय के साथ बढ़ती जाती है। कालान्तर में यही हाई ब्लड प्रेशर का कारण बनता है। इसलिए जरुरी है कि मन को शांत किया जाए। इसके लिए योग और अध्यात्म का सहारा लिया जा सकता है। प्राणायाम, ध्यान, शवासन योग निद्रा, शशांकासन, पद्मासन, पवन मुक्तासन, कूर्मासन, मकरासन आदि आसन हाई ब्लडप्रेशर जैसी बीमारी में बहुत उपयोगी सिद्ध होता है। गुस्सा, परेशानी और नकरात्मक एनर्जी से भी दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए।

2- जीवनशैली में बदलाव और व्यायाम : जीवनशैली में स्वस्थ बदलाव और नियमित व्यायाम के द्वारा भी हाई ब्लडप्रेशर की रोकथाम संभव है। हाई ब्लडप्रेशर का एक बड़ा कारण मोटापा भी होता है। इसलिए व्यायाम आदि के द्वारा मोटापे को नियंत्रित करना जरूरी है। नियमित व्यायाम और भरपूर आराम दोनों बेहद जरुरी है। नियमित दिनचर्या बनाना और उसका पालन करना भी आवश्यक है। हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों के लिए हफ्ते में दो - तीन बार तेल से मालिश कराना भी फायदेमंद होता है।

3- खान-पान में सुधार : हाई ब्लडप्रेशर के होने में खान-पान की भूमिका महत्वपूर्ण है। अमूमन ज्यादा नमक खाने वाले, मांसाहारी भोजन करने वाले, शराब पीने वाले और ज्यादा तेल-मसाले खाने वालों पर हाई ब्लड प्रेशर का खतरा ज्यादा होता है। इसलिए हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों को तैलीय चीजों, मांसाहर, शराब आदि पीने से मना किया जाता है। सफ़ेद नमक की बजाए सेंधा नमक खाने की सलाह दी जाती है। डिब्बाबंद और बासी खाने से भी बचना चाहिए। संतुलित और सात्विक भोजन सबसे बेहतर है।

हाई ब्लड प्रेशर के रोगियों को अपने खाने में हरी सब्जियों और फलों की मात्रा बढ़ानी चाहिए। हरी सब्जियां और मौसमी फल इसमें बहुत फायदेमंद सिद्ध होते हैं। भोजन में लहसुन की मात्रा बढ़ायी जा सकती है। धनिया, गोभी, नारियल का सेवन भी अच्छा है। शहद भी फायदेमंद है। दूध में हल्दी और दालचीनी का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। अखरोट, बादाम, अंजीर, किशमिश जैसे ड्रायफ्रूट्स भी खाना फायदेमंद रहेगा।

( लेखक आयुर्वेद के लिए समर्पित 'निरोगस्ट्रीट' के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं. संपर्क - [email protected] यह लेख मूलतः 'द क्विंट' में प्रकाशित)

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डिस्क्लेमर - लेख का उद्देश्य आपतक सिर्फ सूचना पहुँचाना है. किसी भी औषधि,थेरेपी,जड़ी-बूटी या फल का चिकित्सकीय उपयोग कृपया योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के दिशा निर्देश में ही करें।
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