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अर्जुन कषाय होते हुए भी हॄदय बल्य कैसे ?

By NS Desk | Vaidya Street | Posted on :   13-Dec-2021

अर्जुन नाम इसका शायद इसलिए ही पड़ा होगा जैसे महाभारत में अर्जुन ने अपने हृदय को इतना मजबूत कर लिया था कि वह अपने घर परिवार के लोगों से भी युद्ध कर पाए। ठीक वैसे ही यह भी आपके हृदय को मजबूत बनाता है

कषाय रस संकोचक होता है और संकोचक औषधि हॄदय पर विपरीत असर डालती है फिर भी अर्जुन में हॄदय बल्य का गुण कैसे है ?

ये तो आयुर्वेद से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है कि आयुर्वेद की औषधियां कार्य करने के मामले में बहुआयामी (Multidimensional) होती हैं। कहने का अभिप्राय है कि कभी गुण से तो कभी रस से, तो कभी विपाक से तो कहीं वीर्य और कहीं प्रभाव से कार्य करती हैं। 

चाय पर चर्चा के दौरान हमारे एक मित्र ने बताया कि वह अर्जुन की चाय लेते हैं तो मुझे लगा इस विषय पर पोस्ट करना जरुरी है। दरसअल अर्जुन हमेशा नदियों के किनारे उगता है, बल्कि आप देखेंगे तो पाएंगे कि अर्जुन की जड़े नदी के पानी मे डूबी हुई रहती हैं। नदी के पानी में खनिज प्रचुर मात्रा में रहते हैं और इसके जल में पर्याप्त क्षारीयता रहती है।  यह प्रकृति की व्यवस्था कहिये या अर्जुन का गुण कि अर्जुन वृक्ष में जल में घुले खनिज को अवशोषित करने की क्षमता या गुण पाया जाता है। 

अर्जुन की इस क्षारीयता के कारण इसमें हमारी रक्तवाह्नियों को विस्फारित करने का कर्म पाया जाता है (हमारे शरीर के स्रोतस क्षारीय माध्यम में फैलते हैं और अम्लीयता से सिकुड़ते हैं) जब अर्जुन के सेवन से रक्त वह्नियाँ फैलती हैं तो बड़ा हुआ रक्त भार भी कम होता है जिससे अर्जुन रक्त भार शामक का कार्य भी करता। 

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अर्जुन कषाय और रुक्ष भी होता है जिसके कारण यह रक्त वाहनियों की आंतरिक दीवार पर जमे मेद स्वरूप क्लेद को खरोंचता (scrap) भी है और कषाय रस के कारण रक्त वाहनियों को दृढ़ करता है जिससे एन्यूरिज्म (Aneurysm) और हेमोरेज(Hemorrhage) का खतरा भी कम होता है। 

इसमें कैल्शियम विशेष रूप से पाया जाता है अतः अस्थि संधान कर्म में भी इसका प्रयोग अच्छा रहता है साथ ही जठरशोथ (Gastritis), अल्सरेटिव कोलाइटिस (ulcerative colitis), रेक्टल प्रोलैप्स (rectal prolapse) में भी यह उपयोगी साबित होता है।

अर्जुन नाम इसका शायद इसलिए ही पड़ा होगा  जैसे महाभारत में अर्जुन ने अपने हृदय को इतना मजबूत कर लिया था कि वह अपने घर परिवार के लोगों से भी युद्ध कर पाए। ठीक वैसे ही यह भी आपके हृदय को मजबूत बनाता है क्योंकि हॄदय शरीर का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मर्म है, यह ओज और प्राण का स्थान भी है। हॄदय की मजबूती पूरे शरीर को मजबूती देती है।

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वैसे अर्जुन वृक्ष के कार्य का एक दार्शनिक पक्ष भी है कि जिस प्रकार इसकी जड़ें नदियों के किनारों पर मृदा अपरदन को रोककर नदी के बहाव को और किनारों की रक्षा करती हैं ठीक वैसे ही अर्जुन हमारी रक्त वाहनियों में बह रहे रक्त रूपी नदियों के किनारों अर्थात वाहनियों की आंतरिक दीवाल की रक्षा करता है।

अर्जुन का सेवन हमेशा क्षीरपाक विधि से करने के लिए बताया गया है क्योंकि क्षीरपाक विधि से इसका पाक करने से, दूध की स्निग्धता से अर्जुन की रुक्षता कम होती है और दूध के साथ इसका क्षारीय विलयन तैयार हो जाता है। हाँ यह बात ध्यान रखें क्षीरपाक के लिए गौदुग्ध ही उचित है।

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आम जनमानस से निवेदन है कि इसके लाभकारी गुणों और कर्मों को देखते हुए सम्मोहित होकर बिना युक्ति के इसका प्रयोग न करें अतः प्रयोग करने के पूर्व किसी वैद्य से अपने अग्निबल, आयु, भार आदि अन्य चिकित्सीय पक्षों को जाँच अवश्य करा लें। 

(वैद्य संकेत मिश्र के सोशल मीडिया प्रोफ़ाइल से साभार) 

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डिस्क्लेमर - लेख का उद्देश्य आपतक सिर्फ सूचना पहुँचाना है. किसी भी औषधि,थेरेपी,जड़ी-बूटी या फल का चिकित्सकीय उपयोग कृपया योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के दिशा निर्देश में ही करें।