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बच्चों की सेहत पर मार्केटिंग और विज्ञापन का मंडराता कोरोनावायरस !

By NS Desk | NirogStreet News | Posted on :   20-Feb-2020

बाजार और विज्ञापन के दवाब में बच्चों की सेहत

स्वास्थ्य के लिहाज से पूरी दुनिया के बच्चों का स्वास्थ्य खतरे में है. एक रिपोर्ट में ये बात सामने आयी है. ए फ्यूचर फॉर द वर्ल्डस चिल्ड्रेन (A Future for the World’s Children) नामक ये रिपोर्ट दुनिया भर के 40 से ज़्यादा बाल और किशोर मामलों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के एक आयोग ने जारी की है. विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र बाल कोष और मेडिकल पत्रिका ‘द लॉन्सेट’ ने इस आयोग का गठन किया था. 180 देशों का अध्ययन करने वाली यह रिपोर्ट दर्शाती है कि कोई भी देश पर्याप्त रूप से बच्चों के स्वास्थ्य, उनके पर्यावरण और भविष्य की देखभाल नहीं कर पा रहा है.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रोफ़ेसर और रिपोर्ट तैयार करने में अहम भूमिका निभाने वाले एंथनी कोस्टेलो ने बताया, “मौजूदा समय में किसी भी देश में बच्चों के विकास और स्वस्थ भविष्य के लिए ज़रूरी परिस्थितियाँ मौजूद नहीं हैं.” विश्व में हर बच्चे और किशोर के स्वास्थ्य और भविष्य पर पारिस्थितिकीय क्षरण, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती असमानता और शोषक बाज़ारी दबाव के कारण तत्काल ख़तरा मंडरा रहा है. बच्चों को शक्कर युक्त पेय-पदार्थों, फ़ास्ट फ़ूड, अल्कोहॉल और तंबाकू की ओर खींचा जा रहा है.

प्रोफ़ेसर कोस्टेलो का कहना है कि बच्चों की संभावनाओं को कमज़ोर बनाने में देशों में व्याप्त असमानताओं का भी हाथ है. ऐसे हालात अमीर औद्योगिक देशों, जैसे ब्रिटेन, में भी हैं जहां बाल ग़रीबी और असमानता कई मायनों में गंभीर है. “अपने बच्चों को स्वस्थ बनाने में निर्धनतम देशों को एक लंबा सफ़र तय करना है लेकिन अमीर देश भी अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के ज़रिए सभी बच्चों के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा कर रहे हैं.”

बाजार और विज्ञापन के दवाब में बच्चों की सेहत 
रिपोर्ट के अनुसार मार्केटिंग के प्रभाव नुक़सानदेह और बच्चों के लिए ख़तरा हैं. कई देशों में बच्चे एक साल में 30 हज़ार से ज़्यादा विज्ञापन देखते हैं. वहीं ई-सिगरेट के विज्ञापन अब ज़्यादा संख्या में युवाओं पर केंद्रित हैं और अमेरिका में पिछले दो वर्षों में ऐसे विज्ञापनों में 250 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखी गई जिनकी पहुंच दो करोड़ 40 लाख युवाओं तक रही. 

ब्राज़ील, चीन, भारत और नाइजीरिया में पांच और छह साल के दो-तिहाई से ज़्यादा बच्चे कम से कम एक सिगरेट के लोगो को पहचान सकते हैं.

बताया गया है कि उद्योगों द्वारा अपने आप नियमों का पालन करने की पहल का (सेल्फ़-रैगुलेशन) इसमें कारगर साबित नहीं हुआ है.

उदाहरण के तौर पर, ऑस्ट्रेलिया में उद्योग जगत ने ऐसे नियमों पर सहमति जताई लेकिन उसके बावजूद एक साल में बच्चों और किशोरों ने फ़ुटबॉल, क्रिकेट और रग्बी मैचों के दौरान पांच करोड़ से ज़्यादा अल्कोहॉल के विज्ञापन देखे. सोशल मीडिया पर विज्ञापनों की भरमार स्थिति को और ज़्यादा गंभीर बनाती है.  

इन ख़तरों के अलावा सबसे बड़ा डर ‘निगरानी पूंजीवाद’ का है जिसमें एलगोरिथम के ज़रिए सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए लक्षित ढंग से विज्ञापन दिए जाते हैं.

बच्चों के लिए कई गेम्स ऐसे हैं जो विज्ञापन कंपनियों ने तैयार किए हैं और वे बच्चों से जुटाए गए डेटा को उनकी अनुमति के बग़ैर ऑनलाइन कंपनियों को बेच देती हैं.

रिपोर्ट में कुछ अनुशंसाएं भी जारी की गई हैं जिनके मुताबिक बाल अधिकार संधि में एक वैकल्पिक प्रोटोकॉल जोड़ने का प्रस्ताव है ताकि सोशल मीडिया पर सकारात्मक स्वास्थ्य संदेशों का लाभ उठाया जा सके.

सरकारों व समुदायों से अपील की गई है कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में निवेश के केंद्र में बच्चों को रखा जाना चाहिए. साथ ही वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी को रोकने के लिए पेरिस समझौते के अनुरूप कार्बन उत्सर्जन में कटौती किया जाना ज़रूरी है.


जलवायु परिवर्तन की चुनौती
न्यूज़ीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री और आयोग की सह-प्रमुख हेलेन क्लार्क ने बताया, “बाल और किशोर स्वास्थ्य में पिछले 20 वर्षों के दौरान हुई बेहतरी के बावजूद हाल में प्रगति ठप हो गई है और अब उल्टी दिशा में जाने के लिए तैयार है.”

उन्होंने एक अनुमान के बारे में बताते हुए कहा कि कम और मध्य आय वाले देशों में पांच साल से कम उम्र के क़रीब 25 करोड़ बच्चों पर उनकी संभावनाओं के अनुरूप विकसित ना हो पाने का जोखिम है. लेकिन उससे भी ज़्यादा चिंता की बात है कि विश्व भर में बच्चों के अस्तित्व पर जलवायु परिवर्तन और बाज़ारी दबाव की चुनौती खड़ी हो गई है.

“बाल और किशोर स्वास्थ्य के प्रति देशों को अपने तरीक़ों में बदलाव लाने की आवश्यकता है ताकि ना केवल बच्चों की देखभाल बल्कि उस विश्व का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सके जो उन्हें विरासत में मिलेगा.”

रिपोर्ट में 180 देशों का एक नया ग्लोबल इन्डेक्स तैयार किया गया है जिसमें बच्चों के फलने-फूलने, उनके जीने की संभावना और बेहतर जीवन के अवसरों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण पर आधारित तुलनात्मक अध्ययन किया गया है.

रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि निर्धनतम देशों को बच्चों में स्वस्थ्य जीवन जीने की क्षमता का विकास करने के लिए ज़्यादा प्रयास करने होंगे.

अमीर देशों से होने वाला कार्बन उत्सर्जन सभी बच्चों के भविष्य के लिए ख़तरा है. अगर वर्ष 2100 तक वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी 4 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा हुई तो उसके बच्चों के स्वास्थ्य पर विनाशकारी नतीजे होंगे, कुपोषण बढ़ेगा और मलेरिया, डेंगू जैसी बीमारियाँ फैलने की आशंका बढ़ जाएगी.

इंडेक्स दर्शाता है कि नॉर्वे, कोरिया गणराज्य, नैदरलैंड्स में बच्चों के जीने और स्वास्थ्य कल्याण की संभावना सबसे अधिक है, जबकि मध्य अफ़्रीका गणराज्य, चाड, सोमालिया, निजेर और माली में सबसे कम है. (स्रोत - संयुक्त राष्ट्र समाचार) 

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NS Desk

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