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आयुर्वेद चिकित्सकों पर निर्भर करता है कि वे धन्वंतरि बनना चाहते हैं या नेक्रोमेन्सर?

By Dr Pushpa | NirogStreet News | Posted on :   18-Jan-2020

एलोपैथ ने आयुर्वेद को पीछे धकेल दिया और चिकित्सा और चिकित्सकों का व्यवसायीकरण हो गया

डॉक्टर : धन्वंतरि या नैक्रोमेन्सर

प्राचीन भारत में समाज के दो वर्ग ऐसे थे जिन्हें प्रायोजित दरिद्रता में ही जीवन व्यतीत करना होता था। एक शिक्षक और दूसरा चिकित्सक। शिक्षक की दरिद्रता जहाँ स्ववरेण्य निर्धारित की गई वहीं चिकित्सक की दरिद्रता 'स्मृतियों द्वारा निर्धारित सामाजिक निषेध' पर आधारित थी जिसके अंतर्गत चिकित्सक को उसकी चिकित्सा को 'सेवा' मानकर उन्हें जीवन निर्वाह हेतु सिर्फ एक मुट्ठी अनाज भर देने का निर्देश था। चिकित्साशास्त्र की प्राचीनतम विधा 'आयुर्वेद' को ऋग्वेद का उपवेद माना गया लेकिन वनस्पतियों के चिकित्सकीय उपयोगों का विवरण अथर्ववेद में अधिक मिलता है जिसके कारण सुश्रुत आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद मानते हैं जो अधिक उचित प्रतीत होता है। विडंबना यह थी कि चिकित्साविज्ञान के प्रणेता जिन धन्वंतरि को 'भगवान' माना गया और चिकित्सकों को 'भगवान का अवतार', उन्हें प्रारंभ से ही सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ा।

ऋग्वैदिक आर्य अश्विनीकुमार को वैद्यक का आदर्श मानते थे लेकिन अथर्वण जो भृगुओं से संबंधित थे, चिकित्सा में उन अप्रचलित विधियों का भी उपयोग करते थे जिसका ज्ञान उन्होंने कई विदेशी जातियों से संपर्क द्वारा प्राप्त किया था। प्राचीन आर्य इन्हें तामसिक व आसुरी मानते हुये उन्हें गहृत मानते थे। इसी कारण उन्होंने अथर्वणों का बहिष्कार किया और वसिष्ठ-विश्वामित्र की परंपरा वाले आर्य 'त्रयीविद्या' और अथर्वणों की 'चातुर्वेद' परंपरा के द्वैत में फंस गये जो आज 'त्रिवेदी' और 'चतुर्वेदी' कहलाते हैं। प्राचीन आर्यों के शीर्षस्थ बुद्धिजीवी महर्षियों के बीच इस मतभेद का सुंदर औपन्यासिक विवरण श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने दिया है।

समय गुजरा लेकिन अथर्वण शाखा के प्रति उस अनाम भय के कारण या उनके अधिक शक्तिशाली होने के भय के कारण उनके प्रति सामाजिक संकोच जारी रहा। इसका एक मूल कारण एनाटॉमी के अध्ययन हेतु मृत मानव शरीर की चीर फाड़, विभिन्न रसायनों व विषों के साथ सतत संपर्क में रहने के कारण समाज की दृष्टि में उनका 'अशौच' से ग्रसित होना था। इन्ही की एक विकृत शाखा तंत्र विज्ञान व अघोर साधना की ओर मुड़कर आगे जाकर पथभ्रष्ट हो गई। जो वैद्य राजसत्ता का संरक्षण पाकर 'राजवैद्य' का पद पा जाते थे उनकी शक्ति राजनैतिक गलियारों में भले ही बढ़ जाती हो समाज उन्हें दो मुट्ठी अनाज दे दूर से ही प्रणाम करने में अपनी कुशल मानता था। जाहिर सी बात है चिकित्साविज्ञान की तरफ अभिरुचि सिर्फ उन्हीं लोगों की रही जिन्हें इस विषय का जुनून था।इसे कैरियर रूप में लेने की अभिरुचि कम ही लोगों की रही।

एलोपैथ ने आयुर्वेद को पीछे धकेल दिया 

मध्यकाल में बर्बर आक्रमणकारियों  के हाथों नालंदा जैसे विद्यालयों के विनाश के साथ साथ भारत में चिकित्साविज्ञान की प्रगति भी दम तोड़ गई और गांवों में हिंदू वैद्य अवशिष्ट ज्ञान को दो मुट्ठी अनाज के साथ ढोते रहे। यूरोप में भी डॉक्टर्स व नर्सों को जानलेवा अत्याचारों से गुजरना पड़ा। मुर्दा इंसानी शरीर उपलब्ध ना होने के कारण डॉक्टर्स ने एनाटॉमी के अध्ययन के लिये मुर्दे चुराये और बदले में उन्हें नेक्रोमेन्सर व उनकी सहायिकाओं को 'डायन' घोषित कर जिंदा जला दिया गया। लेकिन यूरोप में एनेस्थीसिया और एंटीबायोटिक की खोज के बाद पूरे विश्व में एलोपैथी छा गई जिंसने प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों के साथ साथ विकसित आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा को पीछे धकेल दिया और साथ ही चिकित्सकों के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार भी अतीत की बात हो गई।

चिकित्सा और चिकित्सकों का व्यवसायीकरण

समाज में सम्मान बढा और पैसा भी लेकिन साथ ही चिकित्साविज्ञान मानवता के कष्ट दूर करने के माध्यम के स्थान पर एक 'लाभदायी कैरियर' बन गया और दवा कंपनियों के कारण एक उद्योग भी। क्या आप विश्वास करेंगे कि एक समय एम आर अर्थात मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव को लेने के लिये डॉक्टर रेलवे स्टेशन जाया करते थे? क्योंकि डॉक्टर अपने मरीजों के लिये नित नई दवाओं की जानकारी से अपडेट रहना चाहता था। समय बदला भारी भरकम दवा उद्योगों पर सर्वाइव करने का दवाब बढ़ा और वे आर एंड डी के नाम पर नई नई दवायें उतारने लगे जिसका प्रिस्क्रिप्शन सिर्फ डॉक्टर ही लिख सकते थे। डॉक्टर्स को अपनी ताकत का अहसास हुआ और उन्होंने इस तंत्र से हाथ मिला लिया और एक ऐसे भ्रष्ट तंत्र का जन्म हुआ जिसमें मरीज एक 'बीमार शरीर' नहीं बल्कि एक 'गिनी पिग' व 'दुधारू जानवर' बन गया जिस पर दवाओं के 'ट्रायल' भी किये जा सकते हैं और उसका मनचाहा 'आर्थिक दोहन' भी किया जा सकता है। इस मानवताद्रोही तंत्र में असीमित लाभ देख कार्पोरेटर्स भी इस दौड़ में उतर गये और एक ऐसी चिकित्सा अपसंस्कृति का जन्म हुआ जिसका लक्ष्य केवल और केवल 'लाभ' है। ये कंपनियां स्वयं ही म्यूटेशन के जरिये म्यूटेंट वायरस व पैथोजन बनाती हैं और उनके एंटीडोट भी। इसके बाद पैथोजन को रिलीज कर दिया जाता है और महामारी के बाद एंटीडोट रिलीज कर अरबों खरबों का मुनाफा कमाया जाता है।

बीमारियों का षड्यंत्र 

कहा जाता है कि स्वाइन फ्लू का कारक 'एच1एन1' वायरस ऐसे ही प्रेरित म्यूटेशन द्वारा विकसित किया गया म्यूटेंट वायरस था। एच आई वी के अमेरिका में कृत्रिम म्यूटेशनल विकास द्वारा उत्पत्ति के विषय में सोवियत संघ द्वारा किया गया दावा भी कुछ ऐसे षडयंत्र की ओर इशारा किया जाता है। कहा ये भी जाता है कि कैंसर का टीका व उपचार खोजा जा चुका है परंतु 'कैंसर इंडस्ट्री' जिसका टर्न ओवर अरबों खरबों का है, के दवाब में मानवता को परे रख उसके टीके व उपचार को 'दबा कर' रखा गया है और इस बीच वे किसी नई बीमारी को ईजाद करने में जुटे हों, कौन जाने?

आयुर्वेद चिकित्सकों पर निर्भर करता है कि वे धन्वंतरि बनना चाहते हैं या मुनाफाखोर ?

चूंकि कारपोरेटर अपनी भ्रष्ट मुनाफाखोरी छोड़ेंगे नहीं और बीमार व्यक्ति अपना इलाज कराने के लिये मजबूर है तो सारा दारोमदार अंततः डॉक्टर्स पर ही आन पड़ता है जो दोंनों के बीच की कड़ी हैं और इस अपसंस्कृति की चाबी भी। मोदीजी ने डॉक्टर्स पर इंगित किया है या नहीं, ये प्रश्न नहीं है बल्कि प्रश्न यह है कि क्या यह तथ्य अधिकांश डॉक्टर्स पर लागू होता है या नहीं? वस्तुतः यह एक प्रहार नहीं बल्कि भ्रष्ट डॉक्टर्स की आत्मा को जगाने का प्रयास है। अब सवाल यह है कि वे क्या बनना चाहते हैं-- धन्वंतरि या नेक्रोमेन्सर?

(ज्ञानेंद्र पांडेय की फेसबुक वॉल से साभार)

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